Sunday, November 23, 2014

Why Take All This Pain?


One doesn’t really need a place –
Calm, quiet and nice.
To contemplate
(And think over the meaninglessness of everything around.)
Even a metropolis city-bus-stop –
Would – in fact – for that purpose suffice.

In the hustle and bustle of the crowd.
Everybody is running around.
Where to, why and for whom –
Aren’t such questions left better untried? 

For isn’t life ultimately an exercise futile?
A journey that starts from shunya.
And –
Must one day end up in the same!
Why then keep on going in circles all along?
If there is nothing really beyond;
Why after-all take all this pain?

What after-all,
O fool!
You are looking for in this gutter?
Being restless –
By its impermanent, materialistic
And hollow glitter.

Let us suppose –
The day comes when you –
Back into the elements get disintegrate.
As it happen must!
Either go up in smoke.
Or –
Just get swallowed by the soil –
And get reduced to dust.

Let there be no illusion,
O dear!
For even then –
Nothing will really change
Over here. 

As it does today –
The world will still be running along.
May be a few days of ‘invented formalities’,
And then even from the memories –
You will be gone.

Weird indeed are the ways of this place.
For in the memory of the selfish race –
One does not really ultimately matter.
Whether he be you, me –
Or for that case,
Even giants like
Gandhi and Hitler.

Saturday, September 4, 2010

Mojito and Eggs.

Mojito and Eggs - Goa, January, 2010.

Friday, August 6, 2010

क्यों लिखता हूँ हिंदी में?



सीधा सा जवाब है - भई हिंदी भाषी हिन्दुस्तानी हूँ इसीलिए. अगर पाकिस्तानी होता, तो अवश्य हिंदी में ना लिखकर उर्दू में लिख रहा होता. पर ईश्वर की असीम अनुकम्पा से वो तो मैं हूँ नहीं.

पर क्या जवाब वास्तव में इतना सीधा-सरल है? शायद नहीं. सीधा होता तब, जब यही सवाल किसी जापानी, फ्रेंच, जर्मन या चीनी से पूछा जाता कि भई आप अंग्रेजी में ना लिखकर जापानी, फ्रेंच, जर्मन या चीनी भाषा में क्यों लिखते हो?  पर हम हिन्दुस्तानियों के साथ मुझे नहीं लगता कि ऐसा है.

लोग हैं जो अक्सर यह पूछ बैठते हैं - "आप बिहारी हो?"

"हाँ. हूँ." - मैं जवाब देता हूँ. और यदि पूछने वाला राज ठाकरे जैसी मानसिकता का शिकार नहीं है तो अक्सर मुझे यह पता होता है कि अगला प्रश्न क्या होने जा रहा है. 

"फिर तो आप बिहारी जानते होंगे?" - अगला प्रश्न. पता नहीं क्यों काफ़ी लोगों को ऐसा लगता है कि "बिहारी" कोई भाषा भी है.

"जी नहीं, बिहारी तो मुझे नहीं आती. और बिहारी कोई भाषा है भी नहीं. हाँ, बिहार में बोलियाँ अवश्य कई सारी बोली जाती हैं जैसे की भोजपुरी, मैथिलि और बज्जिका. मैं बज्जिका-भाषी प्रदेश का रहने वाला हूँ, पर खेद इस बात का है कि मुझे बज्जिका भी नहीं आती." - मैं अपनी इज्जत को ताक पर रख देता हूँ. 

हाँ! यह शत-प्रतिशत सही है कि मुझे अपनी ही बोली नहीं आती. नानाजी नौकरी-पेशा थे और एक ट्रांसफरेबल जॉब में थे, शायद इसी वजह से माँ को कोई स्थानीय बोली नहीं आती थी. नतीजतन घर में हमेशा हिंदी का ही प्रयोग हुआ. कक्षा ४ से हॉस्टल में था इसलिए महनार आना जाना भी छोटी-छोटी छुट्टियों में ही हो पाता था. इसलिए बज्जिका भाषा से बदकिस्मती से अछूता ही रह गया. (यह बात अलग है कि विद्यालय में बंगाली की पढ़ाई होने के कारण बंगाली सिख गया. पर बंगाली को जानना बज्जिका को नहीं जानने का बहाना तो नहीं हो सकता ना?)

फिर दूसरा प्रहार तब हुआ जब विद्यालय से दशम वर्ग कि परीक्षा उत्तीर्ण की.  इससे पहले की भाँप पाता, हिंदी से भी धीरे-धीरे कब दूरी बढ़ती चली गयी पता ही नहीं चला. पहले तो वह कक्षा ११ और १२ के पाठ्यक्रम से गायब हुई, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता अखबार तक अंग्रेजी हो गया. हद तो तब हो गयी जब यह पाया कि भई हिंदी सिनेमा में भी हिंदी की देवनागरी लिपि का नहीं बल्कि अंग्रेजी की रोमन लिपि का प्रयोग हो रहा है. बताइए, हिंदी को सशक्त करने का सबसे सटीक तरीका शायद हिंदी सिनेमा ही होगा, और हिंदी वहाँ से भी निकाल बाहर की गई. यह तो गनीमत है कि ऐसी स्थिति अभी तक अन्य भाषाओं की नहीं हुई है. और शुभ यह है कि आजकल कई हिंदी टी.वी. सिरिअल्स देवनागरी लिपि का प्रयोग करते दिख रहे हैं. 

यह सिर्फ हिंदी की नहीं, बल्कि कमोबेश इस देश की तमाम भाषाओं की वेदना है. देश इतना वृहद् और विभिन्नता भरा है कि इस देश को एकजुट रखने का और परस्पर एक दूसरे को समझने-समझाने का सारा श्रेय अकेली अंग्रेजी के झोले में चला जाता है. ऊपर से समूचे विश्व में शायद हम ही एकमात्र ऐसे देश हैं जहाँ सारी की सारी आर्थिक तरक्की एक मूलतः विदेशी भाषा के कन्धों पर टिकी है. मजाल है किसी की जो अंग्रेजी ना जानते हुए भी इस देश में एक अच्छा कार्पोरेट करिअर बना ले? जापान, फ्रांस, चीन या जर्मनी में तो ऐसा नहीं होता? और ये सारे के सारे राष्ट्र विश्व-भाषा अंग्रेजी को ना जानते हुए भी हमसे कहीं अधिक बड़ी आर्थिक ताकतें हैं. 

ज़िन्दगी जीने की दौड़ में लगे-लगे हिंदी कब व्यक्तिगत रूप से भी बस बोलचाल की भाषा बनकर रह गयी पता ही नहीं चला. स्कूल, कॉलेज की पुस्तकें अंग्रेजी में, हिंदी सिनेमा अंग्रेजी में, दुकानों के बोर्ड्स अंग्रेजी में. यहाँ तक की आजकल छोटे से छोटे होटलों के मेनू कार्ड्स भी अंग्रेजी में ही होते हैं. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजी सही में हमारी ताकत है या केवल आज-तलक गुलाम-मानसिकता में जकड़े होने का प्रमाण. राजनैतिक नेताओं के तरीकों से मैं इत्तेफाक नहीं रखता, पर हाँ इतना अवश्य मुझे समझ में नहीं आता कि अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी ही मातृभाषाओं को होटलों के मेनू कार्ड्स, दुकानों के बोर्ड्स या सिनेमा के पर्दों पर बराबर की जगह क्यों नहीं मिल सकती? 

एक बात है, अंग्रेजी चाहे कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों ना हो जाए, रहेगी वह हमेशा व्यापार की भाषा ही. उसका सम्बन्ध हमेशा पेट से पहले होगा और दिल से बाद में. और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से हैरान-परेशान इंसान कितना भी अंग्रेजी में टाएँ-टाएँ क्यों ना कर ले, सुकून के, अपनत्व भरे दो पलों के लिए वह वापस अपनी मातृभाषा की तरफ ही मुखातिब होगा - फिर उसकी मातृभाषा चाहे हिंदी हो, मराठी हो, बंगाली, पंजाबी, कन्नड़, मलयालयम, मणिपुरी हो या उन १,६५२ भाषाओँ में से कोई हो जो इस देश में बोली जाती हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता. विश्वास नहीं होता तो अपनी भाषा में लिखी कोई साहित्यिक किताब उठाकर देखिये कि वह किस प्रकार आपको मरुभूमि सरीखे ताप से भरे व्यापार जगत से दूर किसी ठंढे, शांत, सुरम्य प्रदेश में ले जा छोड़ती है. 

जब ब्लोगिंग शुरू की तो अंग्रेजी में की. हिंदी से दूरियाँ इस कदर बढ़ गयीं थी कि यह सोच पाना भी मुश्किल हो गया था कि कभी अपनी ही भाषा में कोई ढ़ंग का आर्टिकल लिख पाऊँगा. पर फिर एक कोशिश की तो पाया कि थोड़े से परिश्रम की आवश्यकता है - हिंदी लेखन को भुला नहीं हूँ, बस वह पीछे कहीं खो भर गया है. बस तभी से कोशिश यही है कि अपने हिंदी लेखन को और सशक्त किया जाए और अपने इस ब्लॉग को एक द्विभाषीय ब्लॉग का जामा पहनाया जाए. 

हिंदी में बस इसलिए नहीं लिखता कि एक हिंदी-भाषी हिन्दुस्तानी हूँ, बल्कि इसलिए कि हिंदी में लेखन पूजा है, प्रायश्चित है, साधना है, भक्ति है, इण्डिया बनने की होर में दूर कही पीछे छूटते भारत को पकड़े रहने की कोशिश है. हिंदी में इसलिए लिखता हूँ क्योंकि हिंदी में लेखन एक ज़रिया है खुद को ढूंढ़ निकालने का.


PS - विकिपीडिया के मुताबिक १९६१ में हुए सेन्सस में यह पाया गया था कि भारत में कुल १,६५२  मातृभाषाएं हैं. सम्बंधित आर्टिकल के लिए यहाँ क्लिक करें. 

Monday, July 26, 2010

Silhouette - I

Khushi - In the sweltering hot Mahnar Summer.

Friday, July 23, 2010

महनारनामा


बिट्टू!! उठेगा नहीं? अबेर हो गया है. गंगाजी जाना नहीं है निहाने के लिए? - दादी मच्छरदानी खोलती जाती है और मुझे उठाने की भी कोशिश करती जाती है. 

मैं अनमने भाव से करवट बदलता हूँ और तकिये के बगल में पड़े मोबाइल में समय देखता हूँ. साढ़े ४ बजे हैं अभी सिर्फ .. सुबह के साढ़े ४. बाहर छत पर धुंधलका अभी भी पसरा हुआ है. 

अब दादी की आवाज़ बगल के कमरे से आ रही है .. वो अब प्रयत्नशील है ख़ुशी और बुन्नु को बिस्तर से बाहर निकालने के लिए. 

कुछ देर बाद मुँह-हाथ धोकर हम सब गंगाजी की दिशा में रवाना होते हैं .. अँधेरा अभी भी पूरी तरह से छंटा नहीं है, पर गंगाजी की तरफ लोग अच्छी-खासी संख्या में मुखातिब हैं. 

पर गंगाजी हैं कि वो अब खुद पहले वाली गंगा नहीं रहीं. जो सड़क हमारे घर से गंगाजी की ओर जाती है उसके गंगाजी वाले सिरे पर पीपल का एक बुढ़ा पेड़ काफी दिनों से खड़ा है. करीब ७-८ साल पहले तक गंगा का विस्तार इस पीपल से मुश्किल से करीब १५-२० मी. की दूरी पर हुआ करता था. पर अब गंगा इस स्थान से करीब ३-साढ़े ३ किलोमीटर की दूरी पर बहती है. पता नहीं यह बदलते हुए मौसम-चक्र का दुष्परिणाम है या गंगा ने मात्र अपना रास्ता बदल लिया है. 

पहले जहाँ गंगा बहती थी, वहाँ अब बरसात को छोड़ बाकी सारे वर्ष खेती होती है. हाँ, बरसात के दिनों में यहाँ भी लबालब पानी भर जाता है .. पानी का इतना भयंकर विस्तार - सोंचकर ही कपकपी सी हो जाती है. पीपल के पेड़ की छांह में बैठे बूढ़े बाबा ना जाने कैसे हमारी बातें सुन लेते हैं और पीपल से कुछ दूर एक हलकी सी ऊँची जगह की ओर इशारा कर खुद-ब-खुद कहते हैं -  जे दिन एतना पानी परतउ कि ई ऊचाई तक छू जेतउ उ दिन समझ ले पटना दू-मंजिला इमारत तक डूब जेतउ. 

गंगाजी में नहाने का कार्यक्रम हर दिन का है. हम रोज़ सुबह ४-साढ़े ४ बजे तड़के उठते हैं और गंगा तक की साढ़े ३ किलोमीटर की यात्रा सम्पन्न करते हैं. छोटा सा दल है हमारा - दादी, छोटा बाबू, मैं, ख़ुशी और बुन्नु .. पहले दो-तीन दिन निशु और नितिन भैया भी साथ थे. हर दिन स्नान के दौरान छोटा बाबू ख़ुशी और बुन्नु को पानी में ले जाकर छोड़ देते हैं.  कहते हैं - जब तक डूबेगा नहीं, हेलना कैसे सीखेगा? और वाकई, ख़ुशी १०-१२ दिनों के अंतराल में  में ही तैरना सिख गयी है .. अब बस आवश्यकता है तो थोड़े-बहुत अभ्यास की. स्कूल खुलते-खुलते आशा है वो एक ठीक-ठाक तैराक तो हो ही जायेगी .. स्कूल खुलने में अभी ३ सप्ताह  बाकी भी तो हैं ..

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दूकान से घर और घर से दूकान करते-करते महनार में दिन किस तेज़ी से बीतते हैं  पता ही नहीं चलता. एक दोपहर जब मैं  और ख़ुशी दूकान पर अकेले हैं तो हम जोड़ने की कोशिश करते हैं कि कितनी सारी ऐसी दवाइयां हैं जिनका स्थान हमें पता है और जिन्हें हम छोटा बाबु की अनुपस्थिति में भी बेच सकते हैं .. जोड़-जाड़ के ब-मुश्किल २५-३० माल ऐसा निकलता है जिसके स्थान के बारे में हमारी जानकारी पुख्ता है. अगर इस बात को ध्यान में रखा जाए कि मैं साल में मुश्किल से दो-चार दिन ही महनार आ पाता हूँ और ख़ुशी भी पढ़ाई के लिए पटना में ही रहती है, यह अंक भी शायद एक बड़ी उपलब्धि ही है. 

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घर से जाते-आते रास्ते में लगभग हर कोई मुझे यहाँ पहचानता है .. मगर मैं लगभग किसी को भी ढंग से नहीं जानता. लोग हैं जो अनायास ही पूछ बैठते हैं - त? महनार अब अईसे ही चलतउ? ज़िन्दगी बम्बैय्ये में गुजार देना है या घर भी कभी आना है?

एक शाम लावापुर वाले दादाजी घर आते हैं, मुझे देखकर कहते हैं - महनार आते रहना. ज़िन्दगी में कुछ रखा है? कुछ नहीं रखा. 

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महनार से निकलने वाले दिन तय होता है कि मैं छोटा बाबू के साथ ही मोटर-साइकल पर पटना चला जाऊंगा. दोपहर तक हमें निकलने की बात है, मगर दूकान बंद करते-करते और निकलते-निकलते रात के नौ हो जाते हैं. रास्ता लगभग सुनसान ही है .. बस बीच-बीच में दो-चार बाज़ार हैं जहाँ अभी भी चहल-पहल है. इसके सिवा मौसम लगन का है, इसलिए कहीं-कहीं इक्का-दुक्का बारातें भी मिल जाती हैं .. इसके सिवा हर तरफ अँधेरा पसरा हुआ है और ख़ामोशी है जिसे बस हमारी बातचीत और गाड़ी की आवाज़ ही भंग कर रही है. छोटा बाबू मोटर-साइकल काफी संभल कर चलाते हैं - ३०-३५ की स्पीड से गाड़ी कभी ऊपर नहीं जाती .. मैं बार-बार कोशिश करता हूँ कि हाथ की मुट्ठियों में महनार को जकड़ लूं  मगर महनार है की ३०-३५ की स्पीड से ही सही मुट्ठियों में कैद रेत की मानिंद फिसलता चला जाता है .. अब फिर से एक लम्बा अंतराल होगा ८-१० महीने का इसके पहले की मैं वापस महनार आ सकूँ ..

छद्म किसान का असल परिवार - मैं, ख़ुशी, दादी और बुन्नु - गंगाजी के रास्ते में - पृष्ठभूमि में पसरी सारी ज़मीन कभी गंगा का अभिन्न अंग हुआ करती थी. आज भी बरसात के मौसम में यह हिस्सा पानी से लबालब भरा होता है.


मैंने हल भी चलाया - ज़िन्दगी में पहली बार.


बुन्नु बाबू की ख़ुशी तो देखिये - हल क्या जोत लिया मानो दुनिया की सारी खुशियाँ इनके झोले में आ गयीं.


दादी और मैं - गंगा स्नान के बाद गंगा को पूजते हुए.

P S - ये सारे घटनाक्रम जून, २०१० के प्रथम दो सप्ताह के हैं. काफ़ी दिनों से यह पोस्ट लिख रखा था, पर लैपटॉप के अभाव में तस्वीरें मोबाइल से लैपटॉप पर ट्रांसफर नहीं हो पायीं थीं.