Monday, October 12, 2015

तुम जो नहीं.

ज़िंदगी का सफ़्हा
फिर एक बार
पलटने को है.
अध्याय एक नया
प्रारम्भ -
होने को है.

ज़ुदा होंगे फिर जिन्होंने,
साथ होने का भ्रम दिया था.
आयेंगे नये लोग –
औ’ संग उनके फिर से
साथ होने का छल भी
पुन: आयेगा.

ताज़ा होंगी सूरतें –
इसमें कहीं कोई शक़ नहीं.
मगर उन ताज़ा सूरतों के पीछे छुपा आदमी भी
क्या नया होगा?

कि –
सीरतें भी होंगी नई
इसपर,
अब ऐतबार करने का
दु:साहस नहीं होता.

क्रमश: पुरानी पड़ती किताबों के सफ़्हे
बिखर ना जाएँ कहीं.
आवश्यक है कि
उनको सहेजने-सम्भालने वाली ज़िल्द
पुख्ताहाल रहे.

कहीं अंदर, भीतर
सिहरता बहुत हूँ माँ.
डरता हूँ किसी मोड़ पर
बिखर ना जाएँ पन्ने
ज़िंदगी के.

तुम जो नहीं.


2 comments:

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